Friday, June 22, 2012


                                                 
  आम आदमी 



मैं कवि नहीं  श्रोता हूँ ,
कविता पर खुश होता   हूँ ,   तालियाँ  बजाता  हूँ ;
मेरे पास सुर नहीं है, गा नहीं सकता, 
पर सुर और संगीत मेरे ह्रदय के तारों को झंकृत कर देती है. 
 गाने का आनंद  ले  लेता हूँ ;
 कहानियाँ   मुझे स्वप्न नगरी की सैर करा देती है .
  चित्रों के रंग मेरी आँखों से होते हुए  दिल में उतर जाते है ; 
पर रंगों की कूची पकड़ना तक नहीं  आता.
 मैं उसका पारखी भी नहीं हूँ.
 मेरा स्थान मंच पर कभी नहीं  होता / है,
क्योंकि   मैं श्रोता  हूँ ,   दर्शक हूँ ,  आम आदमी  हूँ ;
पर मेरी जरूरत तो सभी को है ना  !
मैं न  रहूँ  तो इनका सबका क्या महत्व  ?
इन लोगों का क्या महत्व  ?