आम आदमी
मैं कवि नहीं श्रोता हूँ ,
कविता पर खुश होता हूँ , तालियाँ बजाता हूँ ;
मेरे पास सुर नहीं है, गा नहीं सकता,
पर सुर और संगीत मेरे ह्रदय के तारों को झंकृत कर देती है.
गाने का आनंद ले लेता हूँ ;
कहानियाँ मुझे स्वप्न नगरी की सैर करा देती है .
चित्रों के रंग मेरी आँखों से होते हुए दिल में उतर जाते है ;
पर रंगों की कूची पकड़ना तक नहीं आता.
मैं उसका पारखी भी नहीं हूँ.
मेरा स्थान मंच पर कभी नहीं होता / है,
क्योंकि मैं श्रोता हूँ , दर्शक हूँ , आम आदमी हूँ ;
पर मेरी जरूरत तो सभी को है ना !
मैं न रहूँ तो इनका सबका क्या महत्व ?
इन लोगों का क्या महत्व ?
